वर्तमान समाज में परिवार और रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है, घर में लैटरिन का निर्माण! ज्यादा जोर मत डालिये दिमाग पर। यदि आप अभी भी मिडिल क्लास से बिलोंग करते हैं इसका मतलब पहले आप निम्न आय वर्ग से उठकर यहाँ पहुंचे हैं। कुछ ज्यादा नहीं केवल २०-३० वर्ष ही पीछे जाना है आपको। अपने बचपन या अपने गाँव वाली परिस्थितियों के बारे में सोचिये। सोचिये कितना बड़ा परिवार होता था। घर के नाम पर ३-४ कमरे, खपरैल वाले, या फिर बिना प्लास्टर की दीवार वाले। एक मड़ई भी होती ही थी और बहुत बड़ा सा आँगन या खुला मैदान।
इन्हीं व्यवस्थाओं में २०-२५ लोगों का परिवार। दादा-दादी, बुवा-फूफा, चाचा-चाची, उनके बच्चे और आप तथा आपके मम्मी पापा। अब सुबह के माहौल की कल्पना करिये। ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कल्पना करने के लिए क्यूंकि आपने यह माहौल जिया है। सुबह का समय। भोर में ही ४-५ बजे उठ जाना और सबका खेतों की ओर निकल जाना। क्या महिला और क्या ही पुरुष। महिलाएँ लोक-लाज की वजह से थोड़ा और जल्दी भी निकल जाती थीं। यह कार्य सामान्यतः समूहों में होता था। यह समय दिलों के नजदीक आने का और संबंधों में आयी खटास को दूर करना का सबसे उचित समय होता था। शांत दिमाग, शांत वातावरण और सुरक्षा हेतु एक को दूसरे के साथ की तलाश! फिर क्या कितना भी टूटा हुवा रिश्ता क्यों न हो, अपने आप जुड़ जाता था और सारे गिले शिकवे भुला दिए जाते थे।
फिर क्या पुरुष लोग जिनमे बच्चे भी शामिल हैं, २-३ घंटे का मी टाइम व्यतीत कर घर पहुँचते थे और घर पर स्त्रियाँ रसोई का दैनिक कर्म लगभग निपटा चुकी होती थी। इस परम्परा की सबसे ख़ास बात थी कि कोई किसी के सर पर चढ़ा नहीं बैठा होता था और सबको अपना-अपना स्पेस मिलता था। घर में लैट्रिन साफ़ रखने और बदबू आने की कोई भी शिकायत नहीं।
आज कल के घरों में शौंच भी घर में ही करना है। नौकरी के अलावा कोई और बहाना ही नहीं है घर से बहार जाने का। दिन भर मियां, बीवी के सर पर सवार! और इस प्रकार घर के सभी सदस्य घर में जमे रहते हैं। अब जो स्त्रियां जॉब करती है तो उन्हें थोड़ा बाहर निकलने का मौका मिल जाता है लेकिन बहार जाकर भी गुलामी ही।
अब आप इतने बड़े परिवार का आज के शहरी माहौल में ३-४ कमरों और एक या दो बाथरूम के मकानों वाली परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सोचिये। आपकी रूह काँप जाएगी। आपकी सुबह ही ख़राब हो जाएगी। सुबह के बाद दिन तो वैसे भी ख़राब ही होना है। अभी भी हमारे समाज में लैटरिन के इस्तेमाल का बेसिक शऊर नहीं आया है। जैसे- बेसिन साफ़ हो, फर्श गीली न छोड़ी जाये और निपटने के बाद ठीक से फ्लश कर दिया जाये। बाथरूम को ऐसे देखा जाता है की सबसे गन्दी चीज इस घर में यही है। भले ही इतालियन मार्बल या jaquar की फिटिंग ही क्यों न लगायी हो।
किसी का फ़ोन आ जाये कि भाईसाहब हम आपके शहर आ रहे हैं और आपके यहाँ रुकेंगे। आप तुरंत ही धर्म संकट में अपनी पत्नी की तरफ देखेंगे और क्या उत्तर दिया जाये और झट से इस पर ताल-मटोल वाली बढ़िया सी कोई पंक्ति ढूढ़ने लगेंगे। यह डर वास्तव में बाथरूम के इस्तेमाल और सफाई को लेकर होने वाली टेंशन का ही डर है।
भले ही आपने शहर में घर बनवा लिया है और आप क्लास-१ के सरकारी नौकर हैं, फिर भी आप अपने को अमीर लोगों की श्रेणी में मत रखियेगा। अमीर वो होते हैं जिनके घरों में ४-५ गृह कार्य सहायक (सीधे शब्दों में नौकर) की तैनाती हो और आप बिंदास अपने घर में किसी आमंत्रित कर सके, ह्रदय में बिना पत्नी के भय के। एक बेहतर हाउस कीपिंग ही आपके परिवार में एकता ला सकता है और सब ख़ुशी से साथ साथ रह सकते हैं।
एक बिज़नेस आईडिया आया है लिखते-२ ! क्यों न एक अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी डाल दी जाये। नाम रखेंगे- एकता (अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर)।
""घर में होगी खुशियां तभी , जब लेंगे "एकता"की सेवाएं सभी।""
खैर ! इतनी लम्बी चर्चा जरुरी नहीं। मुझे तो इतने सालों बाद यही समझ आया है कि परिवारों में, रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है - घर में लैटरिन का निर्माण!
पढ़ने के लिए साधुवाद ! आप पढ़ते -२ यहाँ तक आये हैं , तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप भी मिडिल क्लॉस हैं और अगर कूद कर इस पंक्ति तक पहुंचे है तो आप सदा मिडिल क्लास ही रहने वाले वाले हैं क्यूँकि आप में सब्र और पढ़ने की आदत दोनों ही नहीं है।
धन्यवाद् !
आपका अपना एक मिडिल क्लास मैन !
©️®️लैटरिन /अनुनाद/आनन्द/१० .१२.२०२५





