Saturday, 4 July 2026

इंतजार. . . .

कारण :-

भूख न होती 

तो खाने की सुगंध का इंतजार न होता . . . . 


झूठ न होता 

तो ये सच जानने का इंतजार न होता . . . . 


अगर पर्दा न होता 

तो ये पर्दा हटने का इंतजार न होता . . . . 


तुम गुस्सा न होते 

तो तुम्हारी मुस्कान का इंतजार न होता . . . . 


तुम बिछड़ते न  

तो फिर मिलने का इंतजार न होता . . . . 



सच:-

इस पल में 

अगले पल का इंतजार 


बच्चे थे 

तो जवान होने का इन्तजार 


बूढ़े हो रहे 

तो पुनः जवान होने की ख्वाहिश 


ताउम्र 

इन ख्वाहिशों के पूरा होने का इंतजार 


सब बातों का एक ही सार 

जीवन का दूसरा नाम है इंतजार 


लेना हो आनन्द 

तो करना सीखो इंतजार !



सारांश :-

जिस दिन दिन इंतजार ख़त्म . . . . . .

समझो जीवन ख़त्म !




सीख:-

बिछड़ते अगर न तुम यूँ 

तो दिल में ये तड़प न होती 

जीवित होने का एहसास न होता 

फिर जीवन में आनन्द न होता . . . . !


ⒸⓇइंतजार/अनुनाद/आनन्द/०४.०७.२०२६ 

Wednesday, 10 December 2025

लैटरिन

वर्तमान समाज में परिवार और रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है, घर में लैटरिन का निर्माण! ज्यादा जोर मत डालिये दिमाग पर। यदि आप अभी भी मिडिल क्लास से बिलोंग करते हैं इसका मतलब पहले आप निम्न आय वर्ग से उठकर यहाँ पहुंचे हैं। कुछ ज्यादा नहीं केवल २०-३० वर्ष ही पीछे जाना है आपको। अपने बचपन या अपने गाँव वाली परिस्थितियों के बारे में सोचिये। सोचिये कितना बड़ा परिवार होता था। घर के नाम पर ३-४ कमरे, खपरैल वाले, या फिर बिना प्लास्टर की दीवार वाले। एक मड़ई भी होती ही थी और बहुत बड़ा सा आँगन या खुला मैदान। 

इन्हीं व्यवस्थाओं में २०-२५ लोगों का परिवार। दादा-दादी, बुवा-फूफा, चाचा-चाची, उनके बच्चे और आप तथा आपके मम्मी पापा। अब सुबह के माहौल की कल्पना करिये। ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कल्पना करने के लिए क्यूंकि आपने यह माहौल जिया है। सुबह का समय। भोर में ही ४-५ बजे उठ जाना और सबका खेतों की ओर निकल जाना। क्या महिला और क्या ही पुरुष। महिलाएँ लोक-लाज की वजह से थोड़ा और जल्दी भी निकल जाती थीं। यह कार्य सामान्यतः समूहों में होता था। यह समय दिलों के नजदीक आने का और संबंधों में आयी खटास को दूर करना का सबसे उचित समय होता था। शांत दिमाग, शांत वातावरण और सुरक्षा हेतु एक को दूसरे के साथ की तलाश! फिर क्या कितना भी टूटा हुवा रिश्ता क्यों न हो, अपने आप जुड़ जाता था और सारे गिले शिकवे भुला दिए जाते थे। 

फिर क्या पुरुष लोग जिनमे बच्चे भी शामिल हैं, २-३ घंटे का मी टाइम व्यतीत कर घर पहुँचते थे और घर पर स्त्रियाँ रसोई का दैनिक कर्म लगभग निपटा चुकी होती थी। इस परम्परा की सबसे ख़ास बात थी कि कोई किसी के सर पर चढ़ा नहीं बैठा होता था और सबको अपना-अपना स्पेस मिलता था। घर में लैट्रिन साफ़ रखने और बदबू आने की कोई भी शिकायत नहीं। 

आज कल के घरों में शौंच भी घर में ही करना है। नौकरी के अलावा कोई और बहाना ही नहीं है घर से बहार जाने का। दिन भर मियां, बीवी के सर पर सवार! और इस प्रकार घर के सभी सदस्य घर में जमे रहते हैं। अब जो स्त्रियां जॉब करती है तो उन्हें थोड़ा बाहर  निकलने का मौका मिल जाता है लेकिन बहार जाकर भी गुलामी ही।   

अब आप इतने बड़े परिवार का आज के शहरी माहौल में ३-४ कमरों और एक या दो बाथरूम के मकानों वाली परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सोचिये। आपकी रूह काँप जाएगी। आपकी सुबह ही ख़राब हो जाएगी। सुबह के बाद दिन तो वैसे भी ख़राब ही होना है। अभी भी हमारे समाज में लैटरिन के इस्तेमाल का बेसिक शऊर नहीं आया है। जैसे- बेसिन साफ़ हो, फर्श गीली न छोड़ी जाये और निपटने के बाद ठीक से फ्लश कर दिया जाये। बाथरूम को ऐसे देखा जाता है की सबसे गन्दी चीज इस घर में यही है। भले ही इतालियन मार्बल या jaquar की फिटिंग ही क्यों न लगायी हो। 

किसी का फ़ोन आ जाये कि भाईसाहब हम आपके शहर आ रहे हैं और आपके यहाँ रुकेंगे। आप तुरंत ही धर्म संकट में अपनी पत्नी की तरफ देखेंगे और क्या उत्तर दिया जाये और झट से इस पर ताल-मटोल वाली बढ़िया सी कोई पंक्ति ढूढ़ने लगेंगे। यह डर वास्तव में बाथरूम के इस्तेमाल और सफाई को लेकर होने वाली टेंशन का ही डर है। 

भले ही आपने शहर में घर बनवा लिया है और आप क्लास-१ के सरकारी नौकर हैं, फिर भी आप अपने को अमीर लोगों की श्रेणी में मत रखियेगा। अमीर वो होते हैं जिनके घरों में ४-५ गृह कार्य सहायक (सीधे शब्दों में नौकर) की तैनाती हो और आप बिंदास अपने घर में किसी आमंत्रित कर सके, ह्रदय में बिना पत्नी के भय के। एक बेहतर हाउस कीपिंग ही आपके परिवार में एकता ला सकता है और सब ख़ुशी से साथ साथ रह सकते हैं। 

एक बिज़नेस आईडिया आया है लिखते-२ ! क्यों न एक अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी डाल दी जाये। नाम रखेंगे- एकता (अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर)। 

""घर में होगी खुशियां तभी , जब लेंगे "एकता"की सेवाएं सभी।"" 

खैर ! इतनी लम्बी चर्चा जरुरी नहीं। मुझे तो इतने सालों बाद यही समझ आया है कि परिवारों में, रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है - घर में लैटरिन का निर्माण!


पढ़ने के लिए साधुवाद ! आप पढ़ते -२ यहाँ तक आये हैं , तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप भी मिडिल क्लॉस  हैं  और अगर कूद कर इस पंक्ति तक पहुंचे है तो आप सदा मिडिल क्लास ही रहने वाले वाले हैं क्यूँकि आप में सब्र और पढ़ने की आदत दोनों ही नहीं है। 

धन्यवाद् ! 

आपका अपना एक मिडिल क्लास मैन !


©️®️लैटरिन /अनुनाद/आनन्द/१० .१२.२०२५ 








Tuesday, 24 December 2024

जरूरी है !


दुनिया में आ गए हो तो आना अच्छा है मगर 

आने के बाद बिरादर यहाँ बने रहना जरूरी है।


पैरों पर खड़े हो गए तो बहुत अच्छा है लेकिन 

खड़े होने के बाद यहाँ लम्बा खड़ा रहना जरूरी है।


भूख लग जाए तो बेटा ये भूख कभी मिटने न देना 

मजा खाने का लेना है तो तुम्हारा भूखे रहना जरूरी है।


मत घबराओ इस आग से जो सीने में धधकती है 

विज्ञान कहता है कि जीवन के लिए गर्मी बहुत जरूरी है।


थोड़े अजीब हो तुम जो सुखों को देख कर डरते हो 

आनन्द जीवन का लेना हो तो दुखों का होना भी जरूरी है।


आनन्द परेशान रहते हो कुछ न कुछ पाने के लिए 

तरक्की के लिए तुम्हारे तुम्हें परेशान रहना जरूरी है।


ईश्वर अब जीवन के इस चरण में तुझसे और क्या माँगू 

जो मिला है उसे सम्भालने को तेरी कृपा का होना जरूरी है। 


दुनिया में आ गए हो आनन्द तो अनुनादित रहो खूब

आने के बाद यहाँ दिलों में सबके बने रहना जरूरी है।


©️®️जरूरी है/अनुनाद/आनन्द/२४.१२.२०२४

Sunday, 28 July 2024

शुरुवात नई !

रात गई 

बात गई 

कल से फिर

शुरुवात नई।



इनने कही 

उनने कही

क्या फ़र्क़ जो 

सामने नहीं कही।


प्यार भी 

दोस्ती भी 

कुछ न मिला 

तो कहानी सही ।


दिया खूब 

मिला नहीं 

वो मुस्कुराये 

और क्या चाहिए।


कल भी 

आज भी 

ज़ेहन में 

अभी भी ।


तुम और तुम 

दुनिया और तुम

मैं और तुम 

शानदार तीसरी पंक्ति।


हक़ भी 

हद  भी  

मन भी 

डर भी ।


तब २०१२

अब २०२४

तब साथ 

अब याद ।


रात गई 

बात गई 

कल से फिर

शुरुवात नई।


©️®️शुरुवात नई /अनुनाद/आनन्द/२८.०७.२०२४


Saturday, 29 June 2024

वो दिन …

 वो भी क्या दिन थे….


तुम्हारे बिगाड़े हुए 

और 

तुम्हीं से बने हुए !


वो भी क्या दिन थे।


©️®️वो दिन/अनुनाद/आनन्द/२९.०६.२०२४


Monday, 3 June 2024

बुराई

समय की धूप में कुछ यूँ तपा हूँ ,
यूँ मैंने ये रंगत सुनहरी पायी है ।
देखी जब भी कोई बुराई किसी में ,
मैंने स्वयं में उस बुराई से दूरी बनाई है।

©️®️बुराई/अनुनाद/आनन्द/०३.०६.२०२४






 

 

Friday, 17 May 2024

शिकायत

मेरी कभी किसी से कोई बहस नहीं हुई,

नाजायज़ मुझसे कोई बात कही नहीं गई, 

मैं उनसे मिला बस एक साफ़ दर्पण की तरह,

पाकर ख़ुद को सामने कोई शिक़ायत नहीं हुई।


©️®️शिकायत/अनुनाद/आनन्द/१७.०५.२०२४