Wednesday, 10 December 2025

लैटरिन

वर्तमान समाज में परिवार और रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है, घर में लैटरिन का निर्माण! ज्यादा जोर मत डालिये दिमाग पर। यदि आप अभी भी मिडिल क्लास से बिलोंग करते हैं इसका मतलब पहले आप निम्न आय वर्ग से उठकर यहाँ पहुंचे हैं। कुछ ज्यादा नहीं केवल २०-३० वर्ष ही पीछे जाना है आपको। अपने बचपन या अपने गाँव वाली परिस्थितियों के बारे में सोचिये। सोचिये कितना बड़ा परिवार होता था। घर के नाम पर ३-४ कमरे, खपरैल वाले, या फिर बिना प्लास्टर की दीवार वाले। एक मड़ई भी होती ही थी और बहुत बड़ा सा आँगन या खुला मैदान। 

इन्हीं व्यवस्थाओं में २०-२५ लोगों का परिवार। दादा-दादी, बुवा-फूफा, चाचा-चाची, उनके बच्चे और आप तथा आपके मम्मी पापा। अब सुबह के माहौल की कल्पना करिये। ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कल्पना करने के लिए क्यूंकि आपने यह माहौल जिया है। सुबह का समय। भोर में ही ४-५ बजे उठ जाना और सबका खेतों की ओर निकल जाना। क्या महिला और क्या ही पुरुष। महिलाएँ लोक-लाज की वजह से थोड़ा और जल्दी भी निकल जाती थीं। यह कार्य सामान्यतः समूहों में होता था। यह समय दिलों के नजदीक आने का और संबंधों में आयी खटास को दूर करना का सबसे उचित समय होता था। शांत दिमाग, शांत वातावरण और सुरक्षा हेतु एक को दूसरे के साथ की तलाश! फिर क्या कितना भी टूटा हुवा रिश्ता क्यों न हो, अपने आप जुड़ जाता था और सारे गिले शिकवे भुला दिए जाते थे। 

फिर क्या पुरुष लोग जिनमे बच्चे भी शामिल हैं, २-३ घंटे का मी टाइम व्यतीत कर घर पहुँचते थे और घर पर स्त्रियाँ रसोई का दैनिक कर्म लगभग निपटा चुकी होती थी। इस परम्परा की सबसे ख़ास बात थी कि कोई किसी के सर पर चढ़ा नहीं बैठा होता था और सबको अपना-अपना स्पेस मिलता था। घर में लैट्रिन साफ़ रखने और बदबू आने की कोई भी शिकायत नहीं। 

आज कल के घरों में शौंच भी घर में ही करना है। नौकरी के अलावा कोई और बहाना ही नहीं है घर से बहार जाने का। दिन भर मियां, बीवी के सर पर सवार! और इस प्रकार घर के सभी सदस्य घर में जमे रहते हैं। अब जो स्त्रियां जॉब करती है तो उन्हें थोड़ा बाहर  निकलने का मौका मिल जाता है लेकिन बहार जाकर भी गुलामी ही।   

अब आप इतने बड़े परिवार का आज के शहरी माहौल में ३-४ कमरों और एक या दो बाथरूम के मकानों वाली परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सोचिये। आपकी रूह काँप जाएगी। आपकी सुबह ही ख़राब हो जाएगी। सुबह के बाद दिन तो वैसे भी ख़राब ही होना है। अभी भी हमारे समाज में लैटरिन के इस्तेमाल का बेसिक शऊर नहीं आया है। जैसे- बेसिन साफ़ हो, फर्श गीली न छोड़ी जाये और निपटने के बाद ठीक से फ्लश कर दिया जाये। बाथरूम को ऐसे देखा जाता है की सबसे गन्दी चीज इस घर में यही है। भले ही इतालियन मार्बल या jaquar की फिटिंग ही क्यों न लगायी हो। 

किसी का फ़ोन आ जाये कि भाईसाहब हम आपके शहर आ रहे हैं और आपके यहाँ रुकेंगे। आप तुरंत ही धर्म संकट में अपनी पत्नी की तरफ देखेंगे और क्या उत्तर दिया जाये और झट से इस पर ताल-मटोल वाली बढ़िया सी कोई पंक्ति ढूढ़ने लगेंगे। यह डर वास्तव में बाथरूम के इस्तेमाल और सफाई को लेकर होने वाली टेंशन का ही डर है। 

भले ही आपने शहर में घर बनवा लिया है और आप क्लास-१ के सरकारी नौकर हैं, फिर भी आप अपने को अमीर लोगों की श्रेणी में मत रखियेगा। अमीर वो होते हैं जिनके घरों में ४-५ गृह कार्य सहायक (सीधे शब्दों में नौकर) की तैनाती हो और आप बिंदास अपने घर में किसी आमंत्रित कर सके, ह्रदय में बिना पत्नी के भय के। एक बेहतर हाउस कीपिंग ही आपके परिवार में एकता ला सकता है और सब ख़ुशी से साथ साथ रह सकते हैं। 

एक बिज़नेस आईडिया आया है लिखते-२ ! क्यों न एक अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी डाल दी जाये। नाम रखेंगे- एकता (अफोर्डेबल हाउस-कीपिंग सर्विस प्रोवाइडर)। 

""घर में होगी खुशियां तभी , जब लेंगे "एकता"की सेवाएं सभी।"" 

खैर ! इतनी लम्बी चर्चा जरुरी नहीं। मुझे तो इतने सालों बाद यही समझ आया है कि परिवारों में, रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है - घर में लैटरिन का निर्माण!


पढ़ने के लिए साधुवाद ! आप पढ़ते -२ यहाँ तक आये हैं , तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप भी मिडिल क्लॉस  हैं  और अगर कूद कर इस पंक्ति तक पहुंचे है तो आप सदा मिडिल क्लास ही रहने वाले वाले हैं क्यूँकि आप में सब्र और पढ़ने की आदत दोनों ही नहीं है। 

धन्यवाद् ! 

आपका अपना एक मिडिल क्लास मैन !


©️®️लैटरिन /अनुनाद/आनन्द/१० .१२.२०२५ 








Tuesday, 24 December 2024

जरूरी है !


दुनिया में आ गए हो तो आना अच्छा है मगर 

आने के बाद बिरादर यहाँ बने रहना जरूरी है।


पैरों पर खड़े हो गए तो बहुत अच्छा है लेकिन 

खड़े होने के बाद यहाँ लम्बा खड़ा रहना जरूरी है।


भूख लग जाए तो बेटा ये भूख कभी मिटने न देना 

मजा खाने का लेना है तो तुम्हारा भूखे रहना जरूरी है।


मत घबराओ इस आग से जो सीने में धधकती है 

विज्ञान कहता है कि जीवन के लिए गर्मी बहुत जरूरी है।


थोड़े अजीब हो तुम जो सुखों को देख कर डरते हो 

आनन्द जीवन का लेना हो तो दुखों का होना भी जरूरी है।


आनन्द परेशान रहते हो कुछ न कुछ पाने के लिए 

तरक्की के लिए तुम्हारे तुम्हें परेशान रहना जरूरी है।


ईश्वर अब जीवन के इस चरण में तुझसे और क्या माँगू 

जो मिला है उसे सम्भालने को तेरी कृपा का होना जरूरी है। 


दुनिया में आ गए हो आनन्द तो अनुनादित रहो खूब

आने के बाद यहाँ दिलों में सबके बने रहना जरूरी है।


©️®️जरूरी है/अनुनाद/आनन्द/२४.१२.२०२४

Sunday, 28 July 2024

शुरुवात नई !

रात गई 

बात गई 

कल से फिर

शुरुवात नई।



इनने कही 

उनने कही

क्या फ़र्क़ जो 

सामने नहीं कही।


प्यार भी 

दोस्ती भी 

कुछ न मिला 

तो कहानी सही ।


दिया खूब 

मिला नहीं 

वो मुस्कुराये 

और क्या चाहिए।


कल भी 

आज भी 

ज़ेहन में 

अभी भी ।


तुम और तुम 

दुनिया और तुम

मैं और तुम 

शानदार तीसरी पंक्ति।


हक़ भी 

हद  भी  

मन भी 

डर भी ।


तब २०१२

अब २०२४

तब साथ 

अब याद ।


रात गई 

बात गई 

कल से फिर

शुरुवात नई।


©️®️शुरुवात नई /अनुनाद/आनन्द/२८.०७.२०२४


Saturday, 29 June 2024

वो दिन …

 वो भी क्या दिन थे….


तुम्हारे बिगाड़े हुए 

और 

तुम्हीं से बने हुए !


वो भी क्या दिन थे।


©️®️वो दिन/अनुनाद/आनन्द/२९.०६.२०२४


Monday, 3 June 2024

बुराई

समय की धूप में कुछ यूँ तपा हूँ ,
यूँ मैंने ये रंगत सुनहरी पायी है ।
देखी जब भी कोई बुराई किसी में ,
मैंने स्वयं में उस बुराई से दूरी बनाई है।

©️®️बुराई/अनुनाद/आनन्द/०३.०६.२०२४






 

 

Friday, 17 May 2024

शिकायत

मेरी कभी किसी से कोई बहस नहीं हुई,

नाजायज़ मुझसे कोई बात कही नहीं गई, 

मैं उनसे मिला बस एक साफ़ दर्पण की तरह,

पाकर ख़ुद को सामने कोई शिक़ायत नहीं हुई।


©️®️शिकायत/अनुनाद/आनन्द/१७.०५.२०२४




Friday, 3 May 2024

कमाई

 

यह समाचार पढ़कर हतप्रभ होने की ज़रूरत नहीं है। ऐसी कई घटनाएँ आपके आँखों के सामने से होकर गुज़री होंगी। ज़रूरत तो है इससे सीख लेने की। गुण, कलाकारी, शौक सब अपनी जगह हैं और जीविका उपार्जन अपनी जगह। गुण, कलाकारी, शौक इन सबसे मिलने वाला सम्मान क्षणिक ही होता है। अन्ततः प्रश्न जीविका का ही उठता है। 

सबसे पहली सीख व्यक्ति को जीवन में जीविका उपार्जन की मिलनी/सीखनी चाहिए। फिर जीविका कमाने के लिए कौन-२ से साधन हो सकते हैं, इसकी सीख मिलनी/सीखनी चाहिए। और माना कि जीविका उपार्जन भी सीख गए तो आगे क्या ? आगे ये कि उपार्जित राशि का प्रबन्धन। ऐसा प्रबंध की उपार्जित राशि भी आपको कमा कर खिलाये। 

इसके बाद आप अपना इतिहास देखिये और अपने पैर जमीन पर रखिये। आपको पता होना चाहिए कि इस जीवन को जीने के लिए आधार भूत ज़रूरतें क्या हैं! दिखावे में न पड़ें। यदि आप राजा महाराजा खानदान से नहीं हैं और आप ग़ैर क़ानूनी धंधे या एक्टिविटी नहीं करते हैं तो बस आप अपने पैतृक घर में रहते हुए दाल रोटी में जीना सीखिए और थोड़ा-बहुत जो बचा लेते हैं उसे निवेश करिए। 

ये निवेश कई प्रकार का हो सकता है। कुछ नया गुण-ढंग सीखने में निवेश करिये जो आपको जीविका के दूसरे साधन भी उपलब्ध कराये। महत्वाकांक्षा रखिये किन्तु बिना पैसे से मिलने वाली चीजों का जैसे- पद्म-श्री पुरस्कार 🥇 ! ध्यान केवल पैसे कमाने पर होना चाहिए। आपके जीवन का पहला मकसद धन कामना होना चाहिए, फिर रिश्ते और उसके बाद तो कुदरत की मार न मिली तो सब कुछ अपने आप ही मिल जायेगा। मुझे जो सीख मिली है कि रिश्ते सर्व-प्रथम होते हैं किन्तु जीवन के अनुभवों ने कुछ और ही दृश्य दिखाएं हैं इसलिए मैंने धन को सर्व-प्रथम ही रखा है। 

कुछ लोग बोलेंगे कि स्वास्थ्य ज्यादा जरुरी है तो भैया मैं ये पोस्ट मैं मरते हुए आदमी के लिए नहीं लिख रहा हूँ। उसके लिए तो अब ये जीवन और मेरा ज्ञान दोनों व्यर्थ ही हैं। 

सम्मान, धन, रिश्ते ज्यादा दिन नहीं टिकने वाले ! टिकेगा तो पैसा कमाने की कला। 

इसलिए बचपन से ही धन कमाने का तरीका सीखना चालू करिये। पढाई काम भर को कर लीजिये। पैसे रहेंगे तो मंहगी वाली पढाई भी हो जाएगी वरना लोन लेकर पढ़ने की कोई जरुरत नहीं है, क्यूँकि अगर आप उस पढाई से धन कमाना सीख भी गए तो बैंक वाले ही ऐश करेंगे।आपका पेट भरेगा या नहीं ! इसकी कोई गारंटी नहीं। 

बड़ी-२ पढ़ाई करने वाले भी धन कमाने का जुगाड़ ही करते हैं और फिर ज्यादा कमाने के लिए भ्रष्टाचार करते हैं ! क्यूँकि वो तो सिर्फ पढ़ें ही हैं न ! धन कमाना तो नहीं सीखे न !

कोविड काल ने तो सिखाया ही है कि जीवन जीने के लिए ज्यादा पैसे जरुरी नहीं है और यदि आपने covishield का टीका लिया है तो फिर और भी घबराने की जरुरत नहीं है। जिसका कोरोना और covishield भी बाल बांका नहीं कर पाया, उसे बस भोजन ही मिल जाये तो वो जी लेगा। बस भोजन भर की व्यवस्था को जरुरी धन कमाने की कला रखिये।  


प्रार्थना- बाकी अमीर बनने के रस्ते तो सदैव खुले ही हैं। ईश्वर आपको पेट भरने मात्र को दिहाड़ी मजदूरी करने के लिए मजबूर न करें।


नोट-मुफ्त राशन मिलने के लिए भी लाल कार्ड चाहिए 😎🙈😉 और अगर आप यह पोस्ट पढ़ रहे हैं तो आप लाल कार्ड लायक भी नहीं है👎। 

©️Ⓡकमाई/अनुनाद/आनन्द/०३.०५.२०२४ 


Saturday, 27 April 2024

मंज़िल और रास्ते

ग़र चाहते हो आनन्द मंज़िल पर पहुँचना,

मंज़िल से ज़्यादा रास्तों का ध्यान रखना।

 

तड़पते रह गये अपन मंज़िल की चाह में,

देखा ही नहीं कि तेरा गाँव भी था राह में।

 

समय कहाँ रुका है तेरे लिये या मेरे लिये,

निहारते बीते दौर को हाथों में तस्वीर लिए।

 

मैं फ़क़त ख़्वाब बुनता रहा तुझे पाने को,

रातों में सोया नहीं सोये भाग जगाने को।

 

मैंने लिखना छोड़ दिया अब क्या फ़ायदा,

भरे घावों को फिर कुरेदने से क्या फ़ायदा।

 

मैंने नशे करके भी देख लिये  दिलरुबा,

ये कदम लड़खड़ाए तो बस तेरे नाम पर 

 

नाम आनन्द है इसलिए खुश तो रहना ही था,

मुझे तेरा नाम और ये ग़म दोनों छुपाना ही था।

 

मैंने लिखना छोड़ दिया अब क्या फ़ायदा,

भरे घावों को फिर कुरेदने से क्या फ़ायदा।


©️®️मंज़िल और रास्ते/अनुनाद/आनन्द/२७.०४.२४



 



Saturday, 27 January 2024

डरता हूँ...

 मैं डरता हूँ 

जब मैं किसी और को 
हद से ज़्यादा 

झुकते हुए देखता हूँ
किसी के पैर छूते देखता हूँ 
आज्ञाकारी बनते देखता हूँ
रोल मॉडल बनाता देखता हूँ
अनावश्यक सम्मान करता देखता हूँ
दुनिया के हिसाब से चलता देखता हूँ
दृढ़ अनुशासन में देखता हूँ
व्यस्त देखता हूँ 
अपनों की चिंता करते देखता हूँ 
भविष्य के विषय में सोचते देखता हूँ 
सफल होते देखता हूँ
उसके बाद का अकेलापन देखता हूँ 
लोगों को उसकी तरफ़ उम्मीद लगाये देखता हूँ
निर्णय लेने में अकेला खड़ा देखता हूँ 
हर गलती का ज़िम्मेदार बनते देखता हूँ
ख़ुद से ही लड़ता देखता हूँ 
अपनी ही सफलताओं से डरता देखता हूँ ।

मैं डरता हूँ 
जब मैं किसी और में 
अपने आप को देखता हूँ!

©️®️डरता हूँ/अनुनाद/आनन्द/२७.०१.२०२४



Saturday, 6 January 2024

पहनावा


“व्यक्ति को कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए…. न पहनने का नहीं !”


सच लिखूँ तो बिना कपड़ों के तो केवल पशु-पक्षी ही ख़ूबसूरत दिखते हैं। 


मानव प्रजाति तो कपड़ों में ही झेली जा सकती है वरना इससे बेकार देखने लायक़ दूसरी कोई चीज नहीं। झेला जाना मैंने इसलिए लिखा कि खूबसूरत होने के लिए कपड़ों के साथ व्यवहार का उत्तम होना भी अनिवार्य है। 


हाँ कुछ डिज़ाइनर लोग कपड़ों को कुछ आड़ा-तिरछा काट एवं सिल कर इसमें भिन्नता तो ला सकते हैं पर कपड़े पहनना तब भी अनिवार्य है। “डोरियों को कपड़ों की संज्ञा नहीं दी जा सकती।”


निवेदन- जीवन सरल बनायें। इसलिए जो सम्भाल सकें उसे ही पहनें। उसके बाद ही आप अपनी, समाज और राष्ट्र की प्रगति के विषय में सोचने का मौक़ा निकाल पाएँगे!


नोट:- उपरोक्त सभी विचारों का बन्द कमरों से कोई वास्ता नहीं है। अपनी निजता के पलों में आप स्वयं ईश्वर हैं। 


“Keep your privacy private.”


प्रणाम🙏


©️®️पहनावा/अनुनाद/आनन्द/०६.०१.२४

Sunday, 31 December 2023

बदला कुछ नहीं

गुजरता यहाँ कुछ भी नहीं 

होता नया कुछ भी नहीं 

नज़रें मिली थी तुझसे बिछड़ते वक़्त 

मैं आज भी हूँ ठहरा वहीं !


चल तो दिये थे पहुँचे कहीं नहीं 

रास्ता लम्बा ये तुझ तक जाता नहीं 

मंज़िल की खोज मैं क्यों करता भला 

जब सफ़र में तू हमसफ़र नहीं !


उम्र बीती पर बीता कुछ नहीं 

आगे बढ़े पर बढ़ा कुछ भी नहीं 

२३ से २४ हुवा पर पूछों बदला क्या 

यादें धुँधली हुईं भूला कुछ नहीं!


©️®️बदला कुछ नहीं/अनुनाद/आनन्द/३१.१२.२०२३



Sunday, 17 December 2023

मुस्कुरा दीजिए

यूँ भी क्यूँ इतना शर्म कीजिए,

इस ओर भी इक नज़र कीजिए …


परेशानी अपनी कुछ यूँ कम कीजिए,

कोई काम हो तो हमारा नाम लीजिए …


दिलों के सौदागर से एक सौदा कीजिए,

दिल की एक कहानी हमारे सुपुर्द कीजिए …


शोख़ इस चेहरे से क़िस्से हज़ार कीजिए,

बस इन क़िस्सों में नाम हमारा कीजिए …


स्याही ये लिखने की न यूँ जाया कीजिए,

सूखने से पहले कोई तो इशारा कीजिए …


मौक़ा निकाल कर लखनऊ घूम लीजिए,

कई पार्क हैं किसी में हमसे मिल लीजिए …


नवाबों के शहर में हैं बस इतना कीजिए,

देख कर हमारी ओर बस मुस्कुरा दीजिए …


©️®️मुस्कुरा दीजिए/अनुनाद/आनन्द/१७.१२.२०२३




Monday, 11 September 2023

लखनऊ की बारिश (११.०९.२०२३)

अमां ऐसी भी कोई बात होती है, 
भला ऐसी भी कोई रात होती है….!

मुझे सोते से जगाया गया कि देखो जरा 
मैंने कहा इतने शोर में भी कोई बात होती है….!

कल रात हमने देखा ऐसा मंज़र 
ऐसी भी भयानक बरसात होती है….!

किसी हृदय की प्रबल वेदना होगी
वरना कहाँ अब ऐसी बरसात होती है….!

यूँ चमकती बिजली का गरजते जाना
डरते दिल ने कहा हर रात की सुबह होती है….!

फूट-फूट कर भर दम रोना-दहाड़ना 
ये टूटे दिल की आम बात होती है….!

ये बेचैनी में रात-२ भर करवटें बदलना 
ये नये आशिक़ों की पुरानी बात होती है….!

दिल में जहर दबाने से कहीं अच्छा
फट पड़ना भी राहत की बात होती है….!

जिसने जगाया मुझे उसे सोने को कह दिया 
ऐसी रात में सोते रहने की अलग बात होती है….!

कल मैं और प्रकृति दोनो अनुनादित थे,
दिल की बात का इजहार जरूरी बात होती है....!

©️®️ लखनऊ की बारिश/अनुनाद/आनन्द/११.०९.२०२३


Friday, 21 July 2023

बिछड़ गए !

भटकना नसीब में था 
इसीलिए
तुमसे बिछड़ गए…..!

आवारगी फ़ितरत न थी 
मगर 
घर से निकल पड़े।

एक शहर से दूसरे घूमे बहुत 
मगर 
कहीं ठहरना न हुवा….!

लोग बहुत जानते है यहाँ हमें
मगर 
कोई अपना नहीं….!

ठहरना चाहा बहुत हमने 
मगर 
कहीं तुम मिले ही नहीं….!

रास्तों से दोस्ती कर ली 
और 
आशियाँ कोई बनाया नहीं….!

भटकना नसीब में था 
इसीलिए
फिर दिल कहीं लगा ही नही…..!

©️®️बिछड़ गए/अनुनाद/आनन्द/२१.०७.२०२३

Friday, 18 November 2022

मुश्किल

बड़ा मुश्किल है इस दौर में 

जहाँ हो, वहीं पर रहना...

एक वयस्क होकर भीड़ में

बच्चों सा दिल रखना।


बड़ा मुश्किल है राजनीति में 

किसी से भी याराना...

जीतने की दौड़ में भला

कहाँ मुमकिन है साथ चल पाना।


बड़ा मुश्किल है संग तेरे मेरा

खुद को बहकने से बचाना...

दूर होकर भी तुझसे मेरा 

खुद को तनहा रखना।


बड़ा मुश्किल है इच्छाओं को

गलत सही के  चक्कर में दबाना...

जलराशि खतरे से ज्यादा हो तो

लाजमी है बाँध का ढह जाना।


बड़ा मुश्किल है सच्चे दिल से 

किसी सच को छुपाना...

चेहरा झूठ बोल भी दे तो 

आँखों से नही हो पाता निभाना।


बड़ा मुश्किल है लोगों से 

ये रिश्ता देर तक छिपाना...

दिल जलों के मोहल्ले में 

मुश्किल है आँखें चुराना।


मैं जो दिल की बात कर दूँ

तो नाराज न हो जाना...

ये तो हक़ है तेरा बोलो 

तुमसे क्या ही छुपाना।


बड़ा मुश्किल है तुझको 

छोड़कर मुझे जाना...

उसके लिए जरूरी है 

हाथों में हाथों का होना।


बड़ा मुश्किल है आनन्द 

अनुनाद में रह पाना...

दुनियादारी निभाने में 

दिल-दिमाग का एक हो पाना।


©®मुश्किल/अनुनाद/आनन्द/१८.११.२०२२



Saturday, 5 November 2022

दायरा

वो दायरा 

जिससे बाहर रहकर 

लोग तुमसे 

बात करते हैं 

मैं वो दायरा 

तोड़ना चाहता हूँ 

मैं तेरे इतना क़रीब 

आना चाहता हूँ।


भीड़ में भी 

सुन लूँ 

तेरी हर बात

मैं तेरे होठों को 

अपने कानों के 

पास चाहता हूँ 

मैं तेरे इतना क़रीब 

आना चाहता हूँ।


स्पर्श से भी 

काम न चले 

सब सुन्न हो कुछ 

महसूस न हो 

तब भी तेरी धड़कन को

महसूस करना चाहता हूँ 

मैं तेरे इतना क़रीब 

आना चाहता हूँ।


चेहरे की सब 

हरकत पढ़ लूँ

आँखों की सब 

शर्म समझ लूँ

मैं तेरी साँसों से अपनी

साँसों की तकरार चाहता हूँ 

मैं तेरे इतना क़रीब 

आना चाहता हूँ।


दायरे सभी 

ख़त्म करने को 

मैं तेरा इक़रार

चाहता हूँ 

हमारे प्यार को 

परवान चढ़ा सकूँ 

मैं तेरे इतना क़रीब 

आना चाहता हूँ।

©️®️दायरा/अनुनाद/आनन्द/०५.११.२०२२


Wednesday, 5 October 2022

सफ़र

दिल में एक उम्मीद जगी है फिर आज 

रेलगाड़ी के सफ़र को मैं निकला हूँ आज।


एक शख़्स ने ले लिया तेरे शहर का नाम 

लो बढ़ गया धड़कनों को सँभालने का काम।


इस गाड़ी के सफ़र में तेरा शहर भी तो पड़ता है 

बनकर मुसाफ़िर क्यूँ चले नहीं आते हो आज।


कैसे भरोसा दिलाएँ कि ज़िद छोड़ दी अब मैंने

बस मुलाक़ात होती है रोकने की कोई बात नहीं।


दिवाली का महीना है, साफ़-सफ़ाई ज़रूरी है

क्यूँ नहीं यादों पर जमी धूल हटा देते हो आज।


धूमिल होती यादों को फिर से आओ चमका दो आज 

पॉवर बढ़ गया है फिर भी बिन चश्में के देखेंगे तुझे आज।


झूठ बोलना छोड़ चुके हम अब दो टूक कहते हैं

नहीं जी पाएँगे तुम्हारे बिना ये झूठ नहीं कहेंगे आज।


तेरे यादों ने अच्छे से सँभाला हुवा है मुझे

फिर मिलेंगे ये विश्वास लेकर यहाँ तक आ गए आज।


दिल में एक उम्मीद जगी है फिर आज 

रेलगाड़ी के सफ़र को मैं निकला हूँ आज।


©️®️सफ़र/अनुनाद/आनन्द/०५.१०.२०२२





Thursday, 22 September 2022

मिलना

तेरा मेरा यूँ मिलना, बोलो ग़लत कैसे

ये संयोग भी ख़ुदा की मर्ज़ी से होता है 

वरना अनुभव तो ये है कि दो लोगों के 

लाख चाहने से भी मुलाक़ात नहीं होती ।


©️®️मिलना/अनुनाद/आनन्द/२२.०९.२०२२



Monday, 19 September 2022

विनम्र

कुछ लोग 

विनम्र होते हैं 

इसलिए वे

सबके सामने 

झुकते हैं …!


इसी विनम्रता

के कारण 

वे पहुँचते हैं

ऊँचाई पर …!


फिर वे 

केवल झुकते हैं

विनम्र नहीं

रहते …!


©️®️ विनम्र/अनुनाद/आनन्द/१९.०९.२०२२



Friday, 16 September 2022

अधूरी इच्छा

तुम्हारे संग 
इच्छा थी 
सब कुछ 
करने की !
मगर….
एक उम्र 
बीतने के बाद 
कोई मलाल नहीं है 
कुछ न कर पाने की 
तुम्हारे संग ।

और अब देखो 
नहीं चाहते हम 
कि हमारी
कोई भी इच्छा
जिसमें तुम हो 
वो पूरी हो !

इन अधूरी इच्छाओं
को पूरा 
करने की कोशिश में 
तुमको मैं अपने
कुछ ज़्यादा
क़रीब पाता 
और महसूस
करता हूँ।

दिमाग़ में बस
तुम होते हो
और धड़कन 
तेज होती हैं!
तुम्हारे पास
होने के एहसास
भर से मैं
स्पंदित 
हो उठता हूँ
और मन 
आनन्द के हिलोरों
पर तैरने लगता है!

इच्छाएँ पूरी 
हो जाती तो 
शायद
तुमसे इश्क़ 
इतना सजीव
न हो पाता!
इसलिए जब भी
इन इच्छाओं को
पूरा करने का मौक़ा
मिलता है तो 
दिल दुवा करता है
कि तेरे संग की
मेरी हर इच्छा
सदा रहे
अधूरी इच्छा…..!

©️®️अधूरी इच्छा/अनुनाद/आनन्द/१६.०९.२०२२